भारत की नौकरशाही, अफ़सरशाही और नेता जिस “मक्कार कार्य संस्कृति” में ढल चुके हैं, लगता है अब उन्हें बदलना बेहद मुश्किल है।कभी सियाचिन में तैनात सैनिकों के जूतों और कपड़ों में भ्रष्टाचार, कभी संसद पर हमले के शहीदों की विधवाओं को पेट्रोल पंप के लिये चक्कर कटवाना, कभी शहीद करकरे की पत्नी को अन्तिम संस्कार का बिल भेजना, कभी कश्मीर और असम में जान हथेली पर लेकर देश की रक्षा करने वाली सेना की आलोचना करना, लगता है देशद्रोहियों की एक जमात खूब फ़ल-फ़ूल रही है।जो राष्ट्र अपने शहीदों और बहादुरों का उचित सम्मान करना नहीं जानता, उसके लिये नपुंसक शब्द का उपयोग करना भी नपुंसकों का अपमान है।
कई बार महसूस होता है कि अफ़ज़ल को फ़ाँसी इसलिये नहीं देना चाहिये कि उसने संसद पर हमला क्यों किया… बल्कि इस बात के लिये देना चाहिये कि आखिर उसने अपना काम ठीक ढंग से क्यों नहीं किया और सफ़ल क्यों नही हुआ? बहरहाल…
Wednesday, November 4, 2009
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